मोहन भागवत का बड़ा बयान : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर हिंदू समाज की एकता, भारत की वैश्विक भूमिका और आत्मनिर्भरता पर जोरदार बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि इसका चरित्र हिंदू समाज से जुड़ा है। इसलिए, अगर देश में कुछ भी अच्छा या बुरा घटित होता है, तो इसके बारे में हिंदुओं से पूछा जाएगा। यह बयान RSS के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित युवा सम्मेलन में दिया गया, जहां भागवत ने युवाओं से अपील की कि वे देश के विकास में योगदान दें। यह भाषण हिंदू समाज की समावेशिता, सद्भाव और नैतिक मूल्यों पर केंद्रित था, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
घटना का संदर्भ और स्थान (Mohan Bhagwat Speech 2026)
यह सम्मेलन मध्य महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले के गंगापुर में हुआ, जहां मोहन भागवत मुख्य वक्ता थे। तारीख 17 जनवरी 2026 को आयोजित इस युवा सम्मेलन में RSS के शताब्दी वर्ष की थीम पर चर्चा हुई। भागवत ने यहां हिंदू समाज की पारंपरिक समावेशिता पर प्रकाश डाला और कहा कि यह समाज सदियों से विविधता को अपनाता आया है। उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि संघ का उद्देश्य केवल एक मजबूत और सामंजस्यपूर्ण समाज का निर्माण करना है, न कि किसी का विरोध या प्रतिस्पर्धा।

मोहन भागवत के प्रमुख बयान और उद्धरण
भागवत ने अपने भाषण में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात की। यहां उनके कुछ मुख्य उद्धरण हैं:
भारत का चरित्र और हिंदू समाज: “भारत में कुछ भी अच्छा या बुरा घटित हो, तो हिंदुओं से इसके बारे में पूछा जाएगा, क्योंकि भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र का नाम नहीं, बल्कि देश का चरित्र है।” उन्होंने जोर दिया कि हिंदू समाज पारंपरिक रूप से समावेशी है, जो रीति-रिवाजों, पहनावे, खान-पान, भाषा, जाति और उपजाति में विविधता को अपनाता है। “इन मतभेदों को संघर्ष का कारण नहीं बनने देता। जो लोग एकीकरण और सद्भावपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, वे हिंदू समाज और देश के सच्चे चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।”
मोहन भागवत का बड़ा बयान
- वैश्विक अपेक्षाएं और भारत की शक्ति: भागवत ने कहा, “विश्व भारत से कुछ अपेक्षा रखता है
- और पर्याप्त शक्ति व प्रभाव होने पर देश सार्थक योगदान देने में सक्षम होगा।
- शक्ति में केवल सशस्त्र बल ही नहीं, बल्कि बुद्धि, सिद्धांत और नैतिक मूल्य भी शामिल होते हैं।
- ” उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे ज्ञान और कौशल प्राप्त करने के लिए विदेश जाएं
- लेकिन उसे भारत के विकास में उपयोग करें।
आत्मनिर्भरता का मार्ग: “हमें स्थानीय वस्तुएं खरीदनी चाहिए। जो चीज यहां नहीं बन सकती, उसे अन्य देशों से खरीदा जा सकता है। भारतीय नीति निर्माता अंतरराष्ट्रीय व्यापार कर रहे हैं, लेकिन किसी के दबाव में नहीं। हमने आत्मनिर्भरता का मार्ग चुना है और हमें इसी मार्ग पर चलना चाहिए। हमें विदेशों में रोजगार सृजन की चिंता नहीं करनी चाहिए, यह उन्हें करना है। जब वैश्वीकरण की बात करते हैं, तो वे वैश्विक बाजार की अपेक्षा रखते हैं। हम वैश्विक परिवार की अपेक्षा रखते हैं।”
हिंदू एकता और मित्रता: “हमें जाति, संप्रदाय, भाषा या व्यवसाय की परवाह किए बिना हिंदू मित्र बनाने चाहिए। इससे समानता स्थापित होगी। संघ पहल करेगा, लेकिन समुदाय को इसका नेतृत्व करना होगा।” उन्होंने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा, “भगवान राम ने भी रावण से बातचीत के जरिए युद्ध टालने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में हथियार उठाए। हमें भी अन्याय के खिलाफ कदम-दर-कदम लड़ना चाहिए।”
युवाओं की भूमिका: भागवत ने युवाओं को देश की प्रगति का आधार बताया। “युवाओं का योगदान देश की प्रगति और भविष्य निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है। संघ न तो किसी का विरोध करता है और न ही किसी से प्रतिस्पर्धा में है।”
भाषण के मुख्य थीम्स और महत्व
मोहन भागवत का यह भाषण हिंदू समाज की एकता पर केंद्रित था, जो सदियों से आक्रमणों और विनाश के बावजूद बनी हुई है। उन्होंने जोर दिया कि हिंदू समाज विविधता को संघर्ष का कारण नहीं बनने देता, बल्कि सद्भावपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है। वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका पर बात करते हुए उन्होंने नैतिक मूल्यों और बुद्धि की शक्ति पर जोर दिया। आत्मनिर्भरता को देश की प्राथमिकता बताते हुए उन्होंने स्थानीय उत्पादों का उपयोग करने की अपील की।
- यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के मुद्दे चर्चा में हैं।
- भागवत का कहना है कि संघ का फोकस समाज निर्माण पर है, न कि राजनीतिक विरोध पर।
- युवाओं से अपील करते हुए उन्होंने कहा कि वे देश के भविष्य हैं और उन्हें एकजुट होकर काम करना चाहिए।
प्रतिक्रियाएं और सोशल मीडिया पर चर्चा
- भागवत के इस बयान पर सोशल मीडिया पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई हैं।
- कुछ लोगों ने इसे हिंदू समाज की एकता का संदेश बताया, जबकि कुछ ने इसे राजनीतिक रूप से देखा।
- RSS समर्थक इसे प्रेरणादायक मान रहे हैं, वहीं विपक्षी इसे धार्मिक ध्रुवीकरण से जोड़ रहे हैं।
- हालांकि, लेख में कोई बाहरी प्रतिक्रिया नहीं दी गई, लेकिन यह बयान राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ सकता है।
निष्कर्ष मोहन भागवत का यह भाषण भारत के चरित्र, हिंदू समाज की समावेशिता और आत्मनिर्भरता पर एक मजबूत संदेश है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे विविधता में एकता बनाए रखें और देश को वैश्विक मंच पर मजबूत बनाएं। यह बयान RSS के शताब्दी वर्ष में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो समाज को मजबूत करने की दिशा दिखाता है। अगर आप हिंदू समाज और राष्ट्रीय मुद्दों में रुचि रखते हैं, तो यह भाषण जरूर पढ़ें या सुनें।
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