ट्रंप के बोर्ड ऑफ : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (शांति बोर्ड) में पाकिस्तान की भागीदारी ने मध्य पूर्व में नई तनातनी पैदा कर दी है। विशेष रूप से इजरायल ने पाकिस्तान की मौजूदगी से स्पष्ट असहजता जताई है। दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ट्रंप के सामने इस बोर्ड में शामिल होने का दस्तावेज साइन किया, लेकिन इजरायल ने इसे गाजा में किसी भी तरह की पाकिस्तानी उपस्थिति के खिलाफ बता दिया। यह घटना गाजा युद्धविराम के दूसरे चरण और पुनर्निर्माण प्रयासों को प्रभावित कर सकती है। आइए जानते हैं पूरी कहानी, कारण और संभावित प्रभाव।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ क्या है और इसका उद्देश्य?
ट्रंप ने पिछले साल सितंबर में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा की थी। इसका मुख्य फोकस गाजा में इजरायल-हमास युद्धविराम के दूसरे चरण को लागू करना, शांति स्थापित करना और क्षेत्र का पुनर्निर्माण करना है। ट्रंप खुद इस बोर्ड के प्रमुख हैं, और इसमें कई देशों को शामिल करने की योजना है। बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र से बेहतर और अधिक प्रभावी बताया जा रहा है।
पाकिस्तान को ट्रंप से निमंत्रण मिला, जिसे शहबाज शरीफ ने स्वीकार कर लिया। दावोस में उन्होंने ट्रंप और अन्य नेताओं के साथ हस्ताक्षर किए। पाकिस्तान ने कहा कि यह फैसला फिलिस्तीनियों को मानवीय सहायता पहुंचाने और स्थायी सीजफायर के लिए है। हालांकि, बोर्ड में शामिल होने की फीस 1 बिलियन डॉलर तक बताई जा रही है, जो विवाद का एक और मुद्दा है।

इजरायल क्यों असहज है पाकिस्तान से?
- इजरायल ने साफ कहा है कि वह गाजा में पाकिस्तान की किसी भी मौजूदगी से सहज नहीं है।
- इजरायली मंत्री निर बरकात ने कहा, “आतंकवाद का समर्थन करने वाले किसी भी देश को गाजा
- की धरती पर सैनिक नहीं उतारने देंगे। हम कतर, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों को स्वीकार नहीं करते
- क्योंकि वे जिहादी संगठनों के समर्थक हैं। हमें उन पर भरोसा नहीं है।”
- भारत में इजरायली राजदूत रेवेन अजर ने भी एनडीटीवी को बताया कि गाजा फोर्स में पाकिस्तान
- की भागीदारी से इजरायल असहज होगा। उन्होंने जोर दिया, “हमास को खत्म करना होगा
- इसके बिना आगे बढ़ना मुश्किल है।” इजरायल का मानना है कि पाकिस्तान जैसे
- देश हमास जैसे संगठनों का समर्थन करते हैं, इसलिए उनकी उपस्थिति शांति प्रयासों को कमजोर कर सकती है।
ट्रंप के बोर्ड में कतर, तुर्की जैसे देश भी शामिल हैं, लेकिन इजरायल ने इनकी भी सैन्य भूमिका का विरोध किया है। हालांकि, बोर्ड में शामिल होने से कोई समस्या नहीं, लेकिन गाजा में सैन्य या प्रत्यक्ष दखल नहीं चाहिए।
पाकिस्तान में भी विरोध का तूफान
#पाकिस्तान में ही इस फैसले पर भारी विरोध हो रहा है। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने कहा कि ऐसे बड़े फैसले बिना पारदर्शिता और सभी राजनीतिक दलों से सलाह के नहीं लिए जा सकते। मजलिस वहदत-ए-मुस्लिमीन (MWM) के नेता अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने इसे “नैतिक रूप से गलत और अस्वीकार्य” बताया।
पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देता, और फिलिस्तीन मुद्दा वहां भावनात्मक है। कई विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप को खुश करने के लिए यह कदम उठाया गया, ताकि अमेरिकी निवेश और सहायता मिल सके, लेकिन इससे घरेलू राजनीति में नुकसान हो सकता है।
वैश्विक प्रभाव और अन्य देशों की स्थिति
- इजरायल: बोर्ड की संरचना से नाराज, खासकर कतर, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों के कारण।
- अन्य देश: यूएई, सऊदी अरब, बहरीन, जॉर्डन जैसे मध्य पूर्वी सहयोगी शामिल हुए।
- चीन, फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताकर इनकार किया।
- भारत: निमंत्रण मिला है, लेकिन अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं। भारत की चुप्पी चर्चा में है।
- यह बोर्ड यूएन को चुनौती दे सकता है, क्योंकि ट्रंप इसे वैश्विक संघर्षों (गाजा, यूक्रेन आदि) के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं।
क्या यह शांति लाएगा या तनाव बढ़ाएगा?
ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ महत्वाकांक्षी है, लेकिन पाकिस्तान की एंट्री से इजरायल का विरोध इसे जटिल बना रहा है। गाजा में हमास को खत्म करने की इजरायली शर्त और पाकिस्तान जैसे देशों पर अविश्वास से शांति प्रयास मुश्किल लग रहे हैं। पाकिस्तान के लिए यह अमेरिका से रिश्ते सुधारने का मौका है, लेकिन घरेलू विरोध से चुनौती भी। क्या यह बोर्ड वाकई शांति लाएगा या नई विवादों का केंद्र बनेगा? समय बताएगा।









