बसंत पंचमी : हिंदू कैलेंडर का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे माघ मास की शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि पर मनाया जाता है। यह दिन मां सरस्वती का जन्मदिन माना जाता है, जो ज्ञान, बुद्धि, विद्या, वाणी और कला की देवी हैं। इस दिन घर-स्कूल-कॉलेज में मां सरस्वती की मूर्ति या चित्र की स्थापना की जाती है और विधि-विधान से पूजा-अर्चना होती है। लेकिन पूजा के बाद सबसे बड़ा सवाल रहता है मूर्ति का विसर्जन कब करें? अगले दिन करना शुभ है या नहीं? शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार, बसंत पंचमी के अगले दिन (षष्ठी तिथि) विसर्जन करना ही सबसे उचित और शुभ माना जाता है। आइए विस्तार से समझते हैं नियम, विधि और महत्व।
बसंत पंचमी का महत्व और अबूझ मुहूर्त
#बसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त वाला दिन कहा जाता है। इसका मतलब है कि इस दिन किसी भी शुभ कार्य (जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या विद्या आरंभ) के लिए अलग से पंडित से मुहूर्त नहीं निकालना पड़ता। इस दिन पीले रंग का विशेष महत्व है – पीले वस्त्र पहनना, पीले फूल चढ़ाना और पीले व्यंजन (केसरिया खीर, हलवा) बनाना शुभ माना जाता है। बच्चे इस दिन पहली बार किताब छूते हैं या अक्षरारंभ करते हैं, क्योंकि मां सरस्वती से विद्या की प्राप्ति होती है।

मूर्ति स्थापना की विधि सरल है:
- पूजा स्थल को साफ करें, गंगाजल छिड़कें।
- लकड़ी की चौकी पर पीला या सफेद वस्त्र बिछाएं।
- मूर्ति को पूर्व या उत्तर दिशा में रखें।
- धूप, दीप, फूल, फल, मिठाई, किताबें, वाद्य यंत्र अर्पित करें।
- मंत्र जाप करें: ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।
अगले दिन विसर्जन क्यों शुभ है?
शास्त्रों में कहा गया है कि देवी की मूर्ति को लंबे समय तक घर में रखने से उनकी दिव्य ऊर्जा का संतुलन बिगड़ सकता है। पूजा का उद्देश्य मां की कृपा प्राप्त करना है, न कि उन्हें स्थायी रूप से घर में रखना। इसलिए बसंत पंचमी के अगले दिन षष्ठी तिथि पर विसर्जन करना परंपरा है। इससे:
- मां की कृपा घर में बनी रहती है।
- पूजा का विधिवत समापन होता है।
- नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है।
पंचांग के अनुसार, अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद और शाम से पहले विसर्जन करना सबसे शुभ है। सूर्यास्त के बाद विसर्जन से बचें, क्योंकि यह समय नकारात्मक ऊर्जा का माना जाता है। 2026 में बसंत पंचमी 23 जनवरी (शुक्रवार) को है, इसलिए विसर्जन 24 जनवरी को किया जाएगा।
विसर्जन की सही विधि और नियम
विसर्जन श्रद्धा और सम्मान से करें:
- सुबह अंतिम पूजा करें – धूप, दीप, फूल, भोग लगाएं।
- क्षमा प्रार्थना करें: अपनी गलतियों के लिए मां से माफी मांगें।
- कलश का जल घर में छिड़कें – इससे विद्या और सुख-शांति बनी रहती है।
- मूर्ति को साफ कपड़े में लपेटें, पैरों से न छुएं।
- पवित्र नदी, तालाब या जलाशय में प्रवाहित करें। घर में ही बड़े बर्तन में जल भरकर भी कर सकते हैं।
- विसर्जन के समय ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः मंत्र जपें और विदाई की प्रार्थना करें।
- वापस घर आकर गंगाजल छिड़कें और घी का दीपक जलाएं।
ध्यान रखने योग्य बातें (डोस एंड डॉन्ट्स):
- डू: इको-फ्रेंडली मिट्टी की मूर्ति इस्तेमाल करें, पर्यावरण बचाएं।
- डू: सम्मानपूर्वक ले जाएं और प्रवाहित करें।
- डोंट: सूर्यास्त बाद विसर्जन न करें।
- डोंट: मूर्ति को पैर से न छुएं या अपमानजनक तरीके से न फेंकें।
- अगर अगले दिन संभव न हो, तो बसंत पंचमी के दिन शाम से पहले विसर्जन कर सकते हैं।
नियमों का पालन से मिलती है पूर्ण कृपा
बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा और अगले दिन विसर्जन दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। शास्त्रों के अनुसार अगले दिन विसर्जन करना पूरी तरह शुभ और परंपरागत है। इससे मां की कृपा बनी रहती है, घर में ज्ञान-बुद्धि का वास होता है और पूजा का फल मिलता है। छोटी-सी गलती से फल कम हो सकता है, इसलिए विधि का सख्ती से पालन करें। इस बसंत पंचमी पर मां सरस्वती आपको विद्या, सफलता और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करें।










